भारत का जांबाज़ योद्धा पृथ्वीराज चौहान से जुड़ी रोचक बाते 🕉 Interesting stories related to India’s brave heart Yoddha Prithviraj Chauhan

भारत का जांबाज़ योद्धा पृथ्वीराज चौहान (India’s brave 💗 Yoddha Prithviraj Chauhan)

पृथ्वीराज चौहान, चौहान वंश का प्रसिद्ध राजा था | पृथ्वीराज चौहान को “राय पिथोरा” और “पृथ्वीराज तृतीय” भी खा जाता हैं | तोमर वंश के राजा अनंग पाल के बेटी का बेटा था और उसके बाद दिल्ली का राजा बना था | राजा बनने के बाद पृथ्वीराज चौहान ने दिल्ली का पूर्ण रूप से नव-निर्माण किया |  उसके अधिकार में दिल्ली से लेकर अजमेर तक का विस्तृत भू-भाग था।

जांबाज़ योधा पृथ्वीराज चौहान की राजनीतिक नीतिया 🟒 (Political policy of Jaabaz Yoddha Prithviraj Chauhan)

पृथ्वीराज चौहान ने अपने वक़्त के विदेशी आक्रमण करने वाले मुहम्मद गौरी को कई बार हराया। युवा पृथ्वीराज ने आरम्भ से ही साम्राज्य विस्तार की नीति अपनाई। पहले अपने सगे-सम्बन्धियों के विरोध को समाप्त कर उसने राजस्थान  के कई छोटे राज्यों को अपने क़ब्ज़े में कर लिया। फिर उसने बुंदेलखंड पर चढ़ाई की तथामहोबा के पास एक युद्ध में चदेलों को पराजित किया। इसी युद्ध में प्रसिद्ध भाइयों, आल्हा और ऊदुल ने महोबा को बचाने के लिए अपनी जान दे दी। पृथ्वीराज ने उन्हें पराजित करने के बावजूद उनके राज्य को नहीं हड़पा। इसके बाद उसने गुजरात पर आक्रमण किया, पर गुजरात के शासक ‘भीम द्वितीय’ ने, जो पहले मुइज्जुद्दीन मुहम्मद को पराजित कर चुका था, पृथ्वीराज को मात दी। इस पराजय से बाध्य होकर पृथ्वीराज को पंजाब तथा गंगा घाटी की ओर मुड़ना पड़ा।

अजमेर की गद्दी 🟒 (Ajmer’s throne)

जब मुइज्जुद्दीन मुहम्मद मुल्तान और उच्छ पर अधिकार करने की चेष्टा कर रहा था, एक चौदह साल का लड़का, पृथ्वीराज अजमेर की गद्दी (throne) पर बैठा। पृथ्वीराज के बारे में कई कहानियाँ मशहूर हैं।

पृथ्वीराज चौहान से जुड़ी कुछ प्रमुख बाते 🟒 (Some important things related to Prithviraj Chauhan)

  1. बचपन से ही उनका बड़ा वैभवपूर्ण वातावरण (environment) में लालन-पालन हुआ।
  2. पांच साल की उम्र में, पृथ्वीराज ने अजयमेरु (अब अजमेर) में विग्रहराज द्वारा स्थापित “सरस्वती कण्ठाभरण विद्यापीठ” से शिक्षा हासिल की।
  3. 15 साल की कम उम्र में पृथ्वीराज ने अपने राज्य का सिंघासन संभाला था।
  4. पृथ्वीराज चौहान छह भाषाओँ को जानते समझते वे बोलते थे, जैसे – प्राकृत, संस्कृत, मागधी, पैशाची, शौरसेनी और अपभ्रंश भाषा। इसके अलावा उन्हें मीमांसा, वेदान्त, गणित, पुराण, इतिहास, सैन्य विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र का भी ज्ञान था।
  5. पृथ्वीराज की सेना में घोड़ों की सेना का बहुत अधिक महत्व था, लेकिन फिर भी हस्ति (हाथी) सेना और सैनिकों की भी मुख्य भूमिका रहती थी। जिसके चलते पृथ्वीराज की सेना में 70,000 घुड़सवार सैनिक थे |
  6. पृथ्वीराज ने युद्धनीति के आधार पर दिग्विजय अभियान चलाया, जिसमें उन्होंने वर्ष 1177 में भादानक देशीय को, वर्ष 1182 में जेजाकभुक्ति शासक को और वर्ष 1183 में चालुक्य वंशीय शासक को पराजित किया था।
  7. घोरी किसी भी प्रकार से पृथ्वीराज को ‘इस्लाम्’ धर्म स्वीकार ने को विवश करना चाहते थे। अतः वह पृथ्वीराज के साथ सह राज नैतिक सम्बन्ध स्थापित करने को तैयार हो गए। परन्तु पृथ्वीराज ‘इस्लाम’ धर्म को अस्वीकार करते हुए दृढ संकल्प लिया था।
  8. घोरी के आदेश पर पृथ्वीराज के मन्त्री प्रतापसिंह ने पृथ्वीराज को ‘इस्लाम’ धर्म को स्वीकारने के लिए समझाया और पृथ्वीराज ने प्रतापसिंह को कहा “मैं घोरी का वध करना चाहता हूँ”। पृथ्वीराज ने आगे कहा कि, “मैं शब्दवेध बाण चलाने में सक्षम हूँ। मेरी उस विद्या का मैं प्रदर्शन करने के लिए तैयार हूँ। तुम किसी भी प्रकार घोरी को मेरी विद्या का प्रदर्शन देखने के लिए तैयार कर दो। तत्पश्चात् राजसभा में शब्दवेध बाण के प्रदर्शन के समय घोरी कहाँ स्थित है ये मुझे बता देना मैं शब्दवेधी बाण से घोरी का वध कर अपना प्रतिशोध ले लूँगा।”
  9. न्यायपूर्ण शासन करते हुए राजा पृथ्वीराज एक बार राजसभा में बैठे थे, उसी समय चन्द्रराज नामक कोई राजा पृथ्वीराज के सम्मुख उपस्थित होता है। वह चन्द्रराज कोई और नहीं पश्चिम दिशा के राजाओँ का प्रमुख था।
  10. राजा पृथ्वीराज चौहान का राजस्थान स्थित अजमेर में समाधि स्थल भी स्थापित किया गया है

पृथ्वीराज की पराजय और मृत्यु 🟒 (The defeat and death of Prithviraj)

  1. गौरी उस अपमानजनक हार का बदला लेने के लिए तैयारी करने लगा।
  2. अगले वर्ष वह 1 लाख 10 हज़ार चुने हुए अश्वारोहियों की विशाल सेना लेकर फिर तराइन के मैदान में आ डटा।
  3. वहां पृथ्वीराज ने भी उससे मोर्चा लेने के लिए कई राजपूत राजाओं को बुलाया था । कुछ राजाओं ने तो अपनी सेनाएँ भेज दी, परन्तु कुछ वक़्त का गाहड़वाल वंशीय कन्नौज नरेश जयचंद्र उससे तटस्थ ही रहा। पृथ्वीराज से विद्वेष रखने के कारण जयचंद्र ने ही मुहम्मद गौरी को भारत पर हमला करने के लिए आमन्त्रित किया था। जयचंद्र पर देशद्रोह का दोषारोपण भी अप्रामाणिक ज्ञात होता है। उसमें केवल इतनी ही सत्यता है कि उसने उस अवसर पर पृथ्वीराज की सहायता नहीं की थी।
  4. पृथ्वीराज के राजपूत योद्धाओं ने उस समय भी मुसलमानी सेना पर बुरा और गहरा प्रहार कर अपनी वीरता का परिचय दिया था, लेकिन देश के दुर्भाग्य से उन्हें पराजित होना पड़ा।
  5. इस प्रकार वर्ष 1248 के उस युद्ध में मुहम्मद गौरी की विजय और पृथ्वीराज की हार हुई थी।
  6. युद्ध में पराजित होने के बाद पृथ्वीराज की किस प्रकार मृत्यु हुई, इस विषय में इतिहासकारों के विभिन्न मत मिलते हैं।
  7. कुछ के मतानुसार वह पहिले बंदी बना कर दिल्ली में रखा गया था और बाद में गौरी के सैनिकों द्वारा मार दिया गया था।
  8. तो कुछ का कहना है कि उसे बंदी बनाकर ग़ज़नी ले जाया गया था और वहाँ पर उसकी मृत्यु हुई।
  9. ऐसा भी कहा जाता है कि पृथ्वीराज का दरबारी कवि और सखा चंदवरदाई अपने स्वामी की दुर्दिनों में सहायता करने के लिए गजनी गया था। उसने अपने बुद्धि कौशल से पृथ्वीराज द्वारा गौरी का संहार कराकर उससे बदला लिया था।
  10. फिर गौरी के सैनिकों ने उस दोनों को भी मार डाला था।

 


Discover more from Hindi Tips 📌

Subscribe to get the latest posts sent to your email.